इस साल हमारे कामों की टोकरी में एक नया काम जुडा. वो काम है खेती में विविधता लाने के लिए पपीते की खेती से किसानों को जोड़ने का. राजस्थान के अलवर जिले के दो गावों – ककराली रामपुरा और खोह दरीबा में पपीते की खेती आम नहीं है. ठीक तरह से रख रखाव होने पर एक साल से भी कम समय में बढ़िया फल देने वाली पपीते की खेती अपेक्षाकृत कम समय में एक किसान की आय बढ़ाने का एक अच्छा जरिया हो सकती है.
इस काम को जमीन पर उतारने के लिए किसानों को तैयार करना एक चुनौतीपूर्ण काम है. किसी भी नयी तरह की खेती के लिए नयी सोच और लगातार सीखने की जिजीविषा वाले किसान होने चाहिए. अगर छोटे किसान पपीते जैसी नई फसल अपनाने की कोशिश करते हैं तो उनके खेत का एक बड़ा हिस्सा लंबे समय तक अन्य फसलों के लिए उपलब्ध नहीं रहता। अनाज को अपने परिवारिक उपभोग के साथ ही बिक्री के लिए हमेशा तरजीह देने वाले किसानों के लिए खेती में इस तरह का बदलाव लाना आसान नहीं है. फिर भी कम समय में 9 किसानों ने इसमें दिलचस्पी और प्रतिबद्धता दिखाई. मार्च की शुरुआत में उन्होंने पपीते की पौध लगाने के लिए अपने खेत तैयार किये. पपीता बेड बनाकर लगाया जाता है. किसानों ने सरसों की फसल काटने से खेत खाली होते ही पपीते की खेती के लिए खेत को तैयार किया.
पपीते की जिस वैरायटी को चुना गया उसका नाम रेड लेडी ७८६ है. पास की एक नर्सरी से किसानों को पपीते की इस वैरायटी की पौध दी गयी. पौध देने के साथ ही उसको लगाने और एक अच्छी फसल तैयार करने का तरीका उनको बताया गया और पौध लगवाई गयी. ये ६ -७ इंच के छोटे-छोटे पपीते के पौधे थे. आम निगाहों से देखने पर ये पौधे बहुत छोटे लग रहे थे. कई किसानों ने कहा कि बहुत छोटे पौधे आए हैं. गर्मी में नहीं बचेंगे. वे संशय में थे. पौधे बेड बनाकर लगाये गए. किसी ने 100, किसी ने 150 तो किसी ने 300 से लेकर ४०० तक पपीते के बगीचे तैयार किये.
ककराली रामपुर गाँव के श्री दीपक धोबी एक हंसमुख किसान है. मेरी फील्ड विजिट (19 मार्च २०२६) उनके पपीते के खेत से शुरू हुई. उनको पपीते लगाये हुए अभी १० -१२ दिन ही हुए थे. उन्होंने बताया वे हर साल सरसों की फसल काटने के बाद तीन महीनों के लिए दिल्ली बेलदारी करने के लिए चले जाते हैं. इस साल पपीते लगाए हैं तो नहीं गए. उनकी देखभाल के लिए रुक गए हैं. इसी तरह किसान महेश जैमन और कुछ अन्य किसानों से मिलकर हम लौट आये. मार्च का महीना साल के उन महीनों में आता है जब मौसम तेजी से बदलता है. इसलिए मन में यही चल रहा था कि बस मौसम साथ दे दे और कुछ दिनों के लिए गर्मी टली रहे.
किसानों ने पपीते के साथ काफी कुछ लगाया है—अपना समय, अपनी मेहनत और खेत तैयार करने में अपना धन। साथ ही उन्होंने इस नई फसल की समुचित देखभाल करने का भी संकल्प लिया। पपीते की पौध डेल्ही प्रीमियर रोटरी सर्विस फाउंडेशन और रोटरी क्लब ऑफ दिल्ली प्रीमियर द्वारा PWABHI (पार्टनर्स फॉर वाटर एक्सेस एंड बेटर हार्वेस्ट इन इंडिया ) प्रोग्राम के अंतर्गत कराई गई थी। आरंगर फाउनडेशन ने किसानों को तैयार किया, फील्ड पर काम करने वाले लोगों द्वारा उन तक इस फसल की जानकारी उपलब्ध करायी, उनको पपीते लगाने की दिशा में प्रेरित किया.
उनके समय, खर्चे और मेहनत का एक दबाव मैंने भी महसूस किया.
अगर सच में पौधे नहीं चले तो?
अप्रैल महीने की शुरुआत से लेकर दूसरे हफ्ते तक मौसम अनुकूल रहा. बीच-बीच में बारिश होती रही. पपीते को मौसम का साथ कुछ दिनों तक मिला. लेकिन अप्रैल के तीसरे हफ्ते में तापमान अचानक चढ़ा. क्या पपीते के पौधे इस अप्रत्याशित तापमान वृद्धि की मार झेल पाएंगे??
अप्रैल महीने के अंत में पौधों की हालत जानने के लिए एक सर्वे किया गया. पहली खबर हमारे खोह दरीबा गाँव के किसान ओम प्रकाश शर्मा से आई. उन्होंने 355 पौधे लगाये थे. उनके एक भी पौधे ही बचे थे. इसी गाँव के एक अन्य किसान दौलत राम मीणा के द्वारा लगाये 250 में से केवल 72 पौधे बचे थे. ये एक झटका था हमारे लिए. जब लगातार मोनिटरिंग हो रही थी तो ऐसा कैसे हुआ, क्यूँ हुआ, कमी कहाँ रह गयी?
इन किसानों से इस पर विस्तार से बात की गयी. शुरूआती बातचीत में दोनों ही किसानों ने अचानक आई गर्मी से पौधों के झुलस जाने की बात कही. किसान ओम शंकर शर्मा के बेटे ने बताया कि वे ट्रैक्टर ड्राइवर है. ट्रेक्टर उनका खुद का नहीं है. सुबह चले जाते हैं, शाम को वापस आते हैं. पौधे देख नहीं पाए ठीक से. एक दो बार फील्ड असिस्टेंट को बताया पर पौधे तेज़ी से मुरझा गए. इनके पास पॉवर लाइन से बिजली आती है. पावर लाइन में ९ बजे से २ बजे तक बिजली दी जा रही है. इसलिए इन्होने तेज़ गर्मी के उन दिनों में दिन में ही सिंचाई की. पौधे तेज़ गर्मी में सिंचाई होने की वजह से झुलस गए ये एक वजह हो सकती है पौधों के ख़राब होने की.
दूसरे किसान, दौलत राम मीणा, के 72 पौधे बचे हैं. इन्होने 250 पौधे लगाये थे. अगर ये 72 पौधे भी नहीं बच पाए तो खोह दरीबा में पपीते की खेती का कोई सफल उदाहरण शेष नहीं रहेगा. किसान की आय नहीं होगी बल्कि उसकी लगत भी मिट्टी में मिल जायेगी. किसान की मेहनत और निवेश दोनों प्रभावित होंगे। साथ ही इस गाँव में पपीते की खेती का एक भी सफल उदाहरण नहीं बचेगा, जिससे दूसरे किसानों को प्रेरित करना भी कठिन हो जाएगा।
पपीते उठे हुए बेड पर लगाये जाते हैं. गड्ढे खोदकर नहीं लगाये जाते जिससे पानी सीधे पपीते की मुख्य जड़ पर ना लगे. पानी की अधिकता से पपीते की जड़ बहुत जल्द सड़ जाती है. इन्होने भी बेड बनाकर ही पपीते लगाये थे. लेकिन उनके खेत पर जब जाकर टीम ने देखा तो पाया कि पपीते के इनके बेड कई जगह दब गए थे. किसान ने पपीतों के कई पौधों की जड़ के पास पानी को कुछ देर टिकाने के लिए गड्ढा कर दिया था जैसा आम तौर पर पौधों के चारों ओर किया जाता है. किसान का सिंचाई का मुख्य तरीका बाढ़ सिंचाई (फ्लड इर्रिगेशन) हैं. यहाँ के सभी किसान इसी तरह से सिंचाई करते हैं. ऐसा लगता है कि दबे बेड और पौध के चारों ओर बनाये गए गड्ढे की वजह से पपीते की पौध सीधे पानी के रास्ते में आई. ज्यादा पानी पपीते का दुश्मन है और पौध ख़राब हो गयी.
किसान ने लम्बी बातचीत में ये भी बताया कि वे पिछले समय में कई बार जयपुर गए. वे वहां ऑनलाइन डिलीवरी कंपनियों के लिए डिलीवरी का कार्य करते हैं। ये उनकी आमदनी का एक जरिया है. महत्वपूर्ण जरिया. नियमित निगरानी न हो पाने और सिंचाई प्रबंधन में हुई कुछ त्रुटियों के कारण उनके दो-तिहाई से अधिक पौधे नष्ट हो गए। पिछले कुछ समय में बचे हुए पौधों के बेड को दुबारा ठीक करने के विषय में कई बार किसान को बताया गया है. दूसरों की पपीते की पौध की वर्तमान तस्वीरे दिखायी हैं. प्रोत्साहन और एक स्वस्थ प्रतियोगिता के लिए.
सत्य नारायण जैमन जिनके 95 में से ५० और भैरू लाल मीणा जिनके 100 में से 65 पौध बचे हैं, उनके पास भी खेत में बिजली ९ से २ बजे तक ही उपलब्ध है. सिंगल फेज बिजली की लाइन खेत पर नहीं है. इसलिए पानी सिर्फ दिन में ही उपलब्ध है. सही समय पर पानी की अनुपलब्धता पपीते की खेती के लिए बड़ी समस्या की तरह आई है.
शुक्र है किसान दीपक धोबी के 135 पौधे बचे हैं. जान कर ख़ुशी हुई. उनसे दुबारा मिलकर मैं २ दिन पहले ही लौटी हूँ. वे इस बार भी खुश थे. उनके पौधे २ फीट के हो चुके हैं. और मजबूत भी दिख रहे हैं. वे अपने खेत में एक पक्का शेड बनवा रहे हैं. शेड बनाने का काम चालू है. खेत में शेड होने से वे खेत की बेहतर देखभाल कर सकेंगे. उनके खेत में सिंगल फेज बिजली उपलब्ध है, वे बताते हैं और ये कि वे शाम को ही सिंचाई करते है. खाद और नीम की खली दोनों रेगुलर डालते हैं.
किसान महेश जैमन के 300 के करीब पौधे बचे हैं. उन्होंने ३३५ पौधे लगाये थे. सबसे सुन्दर दिखने वाला खेत है उनका. पानी शाम ७ बजे के बाद देते हैं, नीम की खली और बकरी के बीट से बनी खाद खेत में एक बाल्टी में मिलाकर रखी है. उसको दिखाते हुए वे बताते हैं कि हर ६-७ दिन में वो थोडा-थोडा पौधों में डालते रहते हैं. पास ही एक छप्पर बनाया है. वे बताते हैं कि छप्पर में रात और दिन गुजार रहे हैं ताकि फसल की निगरानी ठीक से कर सकें. उनके अनुसार नीम की खली के इस्तेमाल से पौधों की वृद्धि में बहुत सुधार हुआ है.
इसके बाद किसान लोकपाल शर्मा जी के खेत पर पंहुंचे. वे खेत पर मौजूद नहीं थे. दूर से उनके पपीते देखे. पपीते के पौधों में अच्छी वृद्धि दिख रही थी. कुल ४२० में से करीब ३७० पौधे बचे हैं उनके. किसान हरकेश शर्मा के खेत पर हम नहीं जा पाए पर उनसे फ़ोन पर हुई बातचीत के आधार पर पता लगा कि उनके २७० के आस पास के पपीते की पौध बची है. पपीते के पौधे ठीक हैं. ये भी एक समर्पित किसान हैं.
किसी एक नयी फसल को सफल बनाने के लिए कितने कारक हो सकते हैं. जिसमें पौधे की गुणवत्ता, और मौसम प्रमुख हैं. अगर इनमें कुछ अंतर आ जाये तो हम सभी को पता है कि कोई भी फसल कारगर नहीं हो सकती. दूसरा समय पर पानी की उपलब्धता. अक्सर हम सिर्फ पानी की उपलब्धता को ही एक कारक मांन लेते हैं. पानी है तो खेती हो जाएगी. पर पानी सिंचाई के लिए उपयुक्त समय पर उपलब्ध है या नहीं ये कारक कम ही लिया जाता है. फसल के लिए बिज़ली दिन के किस समय उपलब्ध होती है इससे तय होगा है कि सिंचाई किस समय होगी. इसके अलावा किसान की उपलब्धता और खेती के लिए उसका समर्पित होना एक महत्वपूर्ण कारक है. छोटी जोत के किसान केवल खेती से घर नहीं चला सकते. किसी भी दूसरे काम में जुड़े होने से उसकी आर्थिक स्थिति संभलती है. लेकिन ऐसी स्थिति में घर पर अगर किसी दूसरे की खेती के लिए उपलब्धता न हो और तो नेक से नेक इरादे से किया गया अच्छे से अच्छी पहल भी बेकार चली जाएगी. जहाँ जल्दी कमाई की संभावना होगी चाहे कमाई कम ही क्यों न हो किसान वहीँ जाएगा. लम्बे समय तक इन्तजार वे नहीं कर पाते. बहुत छोटे और आर्थिक रूप से सीमित संसाधनों वाले किसानों के सामने आजीविका की तात्कालिक आवश्यकताएँ इतनी बड़ी होती हैं कि नई फसलों में समय, श्रम और संसाधनों का निवेश करना उनके लिए अपेक्षाकृत अधिक कठिन हो जाता है।
एक और महत्वपूर्ण बात ये है कि किसी भी नयी फसल के साथ कदम-कदम पर नयी तकनीकी जानकारी की जरुरत पड़ती है. जिसमें सिंचाई से लेकर, रोग, कीड़े, पौधों के विकास के लिए जरुरी खाद, खली आदि की सटीक जानकारी की रियल टाइम में उपलब्धता अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है.
अभी यह प्रयोग अपने शुरुआती चरण में है। नौ किसानों के साथ शुरू हुई यह यात्रा सफलता और असफलता दोनों से सीख रही है। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि इनमें से कितने खेत उत्पादन तक पहुँचते हैं। लेकिन इतना तय है कि इन खेतों ने गाँवों में खेती की नई संभावनाओं पर चर्चा शुरू कर दी है। शायद यही किसी भी नई कृषि पहल की सबसे बड़ी सीख है—पौधे केवल खेत में नहीं उगते, वे किसान के समय, विश्वास, संसाधनों और परिस्थितियों के सहारे बढ़ते हैं।







Leave a Reply