उत्तर प्रदेश का नाम सुनते ही कई ख्याल मन में आते हैं- शायद ताज महल, गन्ने के खेत या सारनाथ के स्तूप। इनमें से एक ख्याल उत्तर प्रदेश में बहती गंगा नदी का भी होता है जिसकी कहानी उत्तर प्रदेश की कहानी से बहुत हद तक जुड़ी हुई है। गंगा नदी की कुल लंबाई का आधे से ज़्यादा हिस्सा उत्तर प्रदेश में है, जिसने निस्संदेह यहाँ के निवासियों के पानी के साथ रिश्ते को आकार दिया है। दूसरी ओर, राज्य में प्रमुख आर्थिक शक्ति होने के नाते कृषि ने भी उत्तर प्रदेश के जल संसाधनों पर अपनी छाप छोड़ी है। इस प्रकार उत्तर प्रदेश में जल प्रबंधन नदियों और कृषि से बहुत प्रभावित है।
24.1 करोड़ से ज़्यादा लोगों (भारत की आबादी का 16.7%) और देश के 7.33% भू-भाग के साथ, यह भारत का सबसे ज़्यादा आबादी वाला और चौथा सबसे बड़ा राज्य है। इसमें भारत के रिन्यूएबल जल संसाधनों का लगभग 20.80% हिस्सा है।[1] इसमें काफ़ी सतही (सरफेस) जल स्रोत हैं। राज्य की प्रमुख नदियों में गंगा, यमुना, घाघरा, गोमती, गंडक और सोन शामिल हैं। राज्य में सालाना भूजल पुनर्भरण (ग्राउंडवाटर रीचार्ज) भी 0.2 m से ज़्यादा है और आम तौर पर सालाना 844.1 mm औसत वर्षा होती है।[2]

उत्तर प्रदेश में नदी जलसंभर (रिवर बेसिन) | राज्य जल संसाधन एजेंसी, यूपी, 2020 द्वारा बनाया गया मानचित्र
कृषि राज्य की जीवन रेखा है, यह राज्य के लगभग 78% लोगों की आजीविका है।[3] सिंचाई में ही राज्य का ज़्यादातर पानी इस्तेमाल होता है। यह राज्य के कुल 161.64 BCM सतही जल और लगभग 65.31 BCM दोहन योग्य भूजल संसाधनों में से लगभग 43.8 BCM सतही जल और लगभग 48.5 BCM भूजल का उपभोग करती है। उत्तर प्रदेश में आने वाली नई परियोजनाओं के साथ सतही जल का उपयोग बढ़ेगा।[1] इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि उत्तर प्रदेश, देश के अन्य अधिकांश हिस्सों की तरह, जल संकट का सामना कर रहा है। यह भी आश्चर्य की बात नहीं है कि उत्तर प्रदेश, देश के किसी भी अन्य क्षेत्र की तरह,सिंचाई और वर्षा जल संचयन की नवाचारी तकनीकों का एक समृद्ध इतिहास रखता है।
हवेली प्रणाली
हवेली प्रणाली उत्तर प्रदेश (और मध्य प्रदेश) के कुछ हिस्सों में प्रचलित एक अनोखी वर्षा जल संरक्षण प्रणाली है। इसमें खेत के चारों ओर मिट्टी के तटबंधों का निर्माण किया जाता है। मानसून के दौरान खेतों में वर्षा जल को रोक कर, मानसून के बाद पानी को निकाल दिया जाता है। चिनाई की दीवारों और स्पिल वे (जल निकास) को शामिल करके इसे संशोधित किया गया है। अध्ययनों में देखा गया है कि हवेली प्रणाली क्षरित भूमि के पुनर्वास में योगदान देती है और उसकी उत्पादकता बढ़ाती है। यह प्रणाली घरेलू आय बढ़ाने और कुओं में भूजल का स्तर सुधारने का भी काम करती है।[4] इसके अलावा, शोधकर्ताओं ने पाया है कि हवेली प्रणाली कार्बन कैप्चर और मिट्टी के जैविक उपजाऊपन में सुधार करने में महत्वपूर्ण रूप से मदद कर सकती है।[5]

चिनाई की दीवार और स्पिलवे का निर्माण (ऊपर बायें); मानसून के दौरान हवेली संरचना में एकत्रित वर्षा जल (ऊपर दायें); मानसून के बाद की फसल से पहले हवेली से पानी निकालना (नीचे बायें); मानसून के बाद हवेली बिस्तर पर गेहूँ की खेती (नीचे दायें) | स्रोत: Singh R, Akuraju V, Anantha KH, Garg KK, Barron J, Whitbread AM, Dev I and Dixit S (2022) [4]
पोखर
हवेली नाम की अनूठी सिंचाई पद्धति के अलावा, उत्तर प्रदेश में, कई अन्य राज्यों की तरह, तालाबों के रूप में भी वर्षा जल संचयन की परंपरा है। इन्हें तालाब, बंधी और पोखर जैसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है। ये यूपी के झाँसी और मिर्ज़ापुर के ऊँचे इलाकों में लोकप्रिय हैं। इन तालाबों का इस्तेमाल घरेलू ज़रूरतों या सिंचाई के लिए किया जाता है। कभी-कभी, मानसून के बाद तालाबों के सूख जाने पर, तालाब के तल पर फसलें उगाई जाती हैं।[7]

उत्तर प्रदेश के कैराना में नवाब तालाब
टांका
टांका आमतौर पर वर्षा जल को इकट्ठा करने के लिए बनाए गए भूमिगत ढके हुए टैंक होते हैं। राजस्थान के टांका से प्रेरित होकर, उत्तर प्रदेश ने वर्षा जल को संग्रहीत करने और कृषि और घरेलू उद्देश्यों के लिए इसका उपयोग करने के लिए टांके अपनाए हैं। विशेष रूप से, सोनभद्र में 5,000 से अधिक भूमिगत वर्षा जल भंडारण टैंक और इतनी ही संख्या में तालाब बनाए गए हैं।[6] ये शुष्क मौसम के दौरान एक महत्वपूर्ण और टिकाऊ जल संसाधन प्रदान करते हैं।

पारंपरिक टांका
उत्तर प्रदेश की कुछ ऐतिहासिक जल प्रबंधन संरचनाएँ
हज़ारों सालों से चली आ रही इन पारंपरिक जल प्रबंधन विधियों के कारण, उत्तर प्रदेश राज्य में कई जल से जुड़े ऐतिहासिक स्थल पाए जाते हैं। उदाहरण के लिए, गंगा के बाढ़ के पानी को संग्रहीत करने के लिए एक प्राचीन टैंक, जो पहली शताब्दी सी.ई. का है, उत्तर प्रदेश के प्रयागराज के शृंगवेरपुरा में पाया गया है।[8] अन्य जल विरासत स्थलों में शामिल हैं:

बरुआसागर एक कृत्रिम झील है जिसे ओरछा के बुंदेला राजा उदित सिंह ने 1705 और 1707 सी.ई. के बीच बनवाया था।[9]

शुक्ल तालाब: इस तालाब का निर्माण जहानाबाद के नवाब अलमास अली खान के अधिकारी शीतल शुक्ला ने करवाया था।[10]
आगे की राह
अपने विशाल जल संसाधनों के बावजूद, यूपी में भूजल निष्कर्षण का चरण 70.54% है जिसे सेमी क्रिटिकल की श्रेणी में रखा जाता है ।[2] इसके अलावा, यूपी की नदियाँ बहुत अधिक प्रदूषण के स्तर से जूझ रही हैं जिसके बड़े हिस्से जलीय पारिस्थितिकी का समर्थन करने लायक प्रवाह से रहित हैं। यूपी के कई बड़े हिस्से पानी के तनाव का सामना कर रहे हैं।[1]
इन पारंपरिक जल संचयन विधियों में भूजल संसाधनों और नदियों पर तनाव को कम करने की क्षमता है। ये तकनीकें जिनमें वर्षा जल का भंडारण शामिल है, प्रदूषित अपवाह को नदियों में मिलने से भी रोक सकती हैं। वे स्वस्थ पर्यावरण बनाने में और सूखे और बाढ़ के प्रभावों को कम करने में मदद करती हैं। ये तकनीकें जलवायु परिवर्तन का समाधान निकालने की रणनीति का हिस्सा हो सकती हैं। हालाँकि, उपेक्षा और बदलते मौसम के कारण उनका अभ्यास कम हो गया है।[4]
हमें उनके पुनरुद्धार के लिए काम करने की ज़रूरत है क्योंकि ये तकनीकें अक्सर पानी से संबंधित कई गंभीर समस्याओं का एक टिकाऊ, सस्ता और पर्यावरण के अनुकूल समाधान हैं। इसके साथ वैज्ञानिक अनुसंधान, दस्तावेज़ीकरण, स्थानीय समुदायों की भागीदारी बढ़ाना और इन मुद्दों के बारे में जागरूकता फ़ैलाना भी महत्त्वपूर्ण है।
संदर्भ
- UP State Water Policy Draft, 2020, https://www.nitiforstates.gov.in/public-assets/Policy/policy_files/PSSNAE000086.pdf
- National Compilation on Dynamic Ground Water Resources of India, 2024, CGWB: https://cgwb.gov.in/cgwbpnm/public/uploads/documents/17357182991031590738file.pdf
- India Water Resource Information System, Page on Uttar Pradesh: https://indiawris.gov.in/wiki/doku.php?id=uttar_pradesh
- Singh R, Akuraju V, Anantha KH, Garg KK, Barron J, Whitbread AM, Dev I and Dixit S (2022) Traditional Rainwater Management (Haveli cultivation) for Building System Level Resilience in a Fragile Ecosystem of Bundelkhand Region, Central India. Front. Sustain. Food Syst. 6:826722. doi: 10.3389/fsufs.2022.826722
- R.K. Sahu, A.K. Rawat, D.L.N. Rao, Traditional rainwater management system (‘Haveli’) in Vertisols of central India improves carbon sequestration and biological soil fertility, Agriculture, Ecosystems & Environment, Volume 200, 2015, Pages 94-101, ISSN 0167-8809, https://doi.org/10.1016/j.agee.2014.11.005
- NITI for States: Tanks in UP, https://www.nitiforstates.gov.in/best-practice-detail?id=100052
- Rainwater Harvesting and Artificial Recharge, CGWB, Ministry of Water, New Delhi, 2011: https://cgwb.gov.in/cgwbpnm/public/uploads/documents/1686136871443876411file.pdf
- Reviving traditional rain-water harvesting system and artificial groundwater recharge, NIRBAN LASKAR, Sadhana (2022), Indian Academy of Sciences, https://doi.org/10.1007/s12046-022-02035-6
- District Jhansi Tourism: https://jhansi.nic.in/hi/tourist-place/%E0%A4%AC%E0%A4%B0%E0%A5%81%E0%A4%86%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A4%B0/
- Kanpur Dehat: History, https://kanpurdehat.nic.in/history/
- Picture Credits: Nawab Talaab- Wikimedia Commons, Author: Umarkairanvi, Taanka- Wikimedia Commons, Author: Spiritualfade, Barua Sagar- District Jhansi Tourism: https://jhansi.nic.in/hi/tourist-place/%E0%A4%AC%E0%A4%B0%E0%A5%81%E0%A4%86%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A4%B0/, Shukla Talab- Wikimedia Commons, Author: Ngodara
- Creative Commons Information: https://creativecommons.org/licenses/by-sa/3.0/deed.en
- मुख्य चित्र: सिद्धार्थ नगर, उत्तर प्रदेश के एक नीचले भू-भाग में अन्य फसलों के साथ कमल की खेती। यह क्षेत्र नेपाल सीमा के समीप स्थित है।






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