तालाबः कई समस्याओं का अकेला जवाब


अनुपम जी का दिल जिन साथियों के लिए धड़कता था और जिन साथियों के दिल अनुपमजी के लिए धड़कते हैं, उन सब साथियों को मेरा प्रणाम । तालाब का नाम आते ही अनुपम जी का नाम अपने आप जुबान पर आ जात है । और अनुपम जी का नाम आते ही तालाब की छबि दिमाग में उभर आती है ।

अनुपम जी ने पानी, तालाब समाज के आपसी संबंध को बहुत ही सरल भाषा में लिखकर घर-घर पहुंचा दिया है। तालाब पुस्तक सिर्फ एक पुस्तक नहीं है। सिर्फ तालाबों का वर्णन नहीं है। बल्कि यह पानी से, समाज से जुड़ी हर समस्या का हल बताती है। अनुपम जी ने तालाब को सिर्फ पानी रोकने का एक जरिया न समझते हुए समाज की हर समस्या के हल के रूप में देखा और तब ये पुस्तक लिखी ।

बातचीत में वे हमें बताते थे कि किसानों को सरकार की मुफ्त की योजनाओं की कोई जरूरत नहीं है। उन्हें तो बस भगवान के द्वारा समुद्र के खारे पानी को मीठा बनाकर उनके खेतों में जो पहुंचाता है उसको समझने की जरूरत है। जिसके खेत में जितना पानी बरसा वह उसकी किस्मत का पानी है । उस पानी को अपने ही खेत में तालाब बनाकर रोक लो। पानी भी रुकेगा और मिट्टी भी । पानी और मिट्टी के निर्बाध बह जाने से ही किसान कंगाली की इस स्थिति में पहुंच गए हैं। किसानों की, समाज की हर समस्या का हल तालाब है। पानी रुकेगा तो मिट्टी रुकेगी । इससे फसल अच्छी होगी । किसान की आर्थिक स्थिति अच्छी होगी। किसान की आर्थिक स्थिति अच्छी होगी तो उसे सरकार की योजनाओं पर अवलंबित नहीं रहना पड़ेगा। किसानों को सरकार की गुलामी से मुक्ति दिलाने का सबसे महत्वपूर्ण जरिया है – तालाब |

गांव वालों की सेवा करने के उद्देश्य से सन् 1997 में जब मैंने वलनी गांव जाना शुरू किया तब मुझे नहीं पता था कि क्या करना है ? तभी मेरे एक मित्र ने मुझे ‘आज भी खरे हैं तालाब’ पुस्तक भेंट की । पुस्तक पढ़कर जीवन का लक्ष्य निर्धारित हो गया। सौभाग्य से उन्हीं दिनों अनुपम जी नागपुर आए। उन्हें हम वलनी गांव लेकर गए। वहां पर उन्होंने तालाबों की महत्ता और आवश्यकता पर बातचीत की।

पहली मुलाकात में उन्होंने हम से दो बातें कहीं। पहली, “जिंदगी में सिर्फ एक गांव को बना सको तो अपने आपको धन्य समझना। दस, बीस, पचास गांवों को एक साथ ठीक कर दूंगा। यह लक्ष्य कभी भी नहीं रखना। दूसरा, जिंदगी में कभी भी दान के पैसे से सेवा नहीं करना ।”

शुरू में तो ये बातें बड़ी अजीब लगीं। क्योंकि जिधर भी देखते थे संस्थाएं कई-कई गांवों में काम कर रही होती थीं । दान के पैसे से हजारों तालाब बना रही थीं। हमें रोक दिया गया था कि ऐसा नहीं करना है। समझ में नहीं आता था कि फिर होगा कैसे ? क्या करना है यह भी नहीं बताया था । हम हल ढूंढ़ते थे। आखिर सन् 2006 में हमें हल मिल ही गया । मेरा मोटर – पार्ट्स का व्यवसाय है । एक दिन मेरे एक कस्टमर, जिनके पास जेसीबी मशीन और ट्रक आदि हैं – हमारी दुकान पर आए। मैंने उनसे पूछा कि आपकी इन मशीनों का एक दिन का किराया कितना होता है ? उन्होंने आठ घंटे का जेसीबी या अन्य मशीन का किराया दस हजार बताया। इन आठ घंटों में चालीस ट्रक मिट्टी तालाब से निकलेगी जो किसानों के खेत में काम आएगी। मैंने हिसाब लगाया 40 ट्रक मिट्टी यानी एक ट्रक का करीब 250 रुपए मूल्य होगा । उसी शाम हमने किसानों की एक बैठक आयोजित की । उस मीटिंग में हमने किसानों को बताया कि इतने सालों से कण-कण बहते हुए हमारे तालाबों में मिट्टी जमा हो गई है। इस वजह से हमारा तालाब मर गया है, बुझ गया है। उसे हम 250 रुपए में ठीक भी कर पाएंगे और ये मिट्टी जो आपके खेतों में पहुंचेगी उससे फसल भी दुगनी हो जाएगी। किसानों को इस बात का अंदाजा था । वे ज्यादा जानकार थे। उन्होंने हामी भरी और देखते ही देखते हमारे गांव में आठ लाख रुपए इकट्ठे हो गए। आठ लाख रुपए हमने ठेकेदार को दिए और जिसने जितने ट्रक मिट्टी के पैसे दिए थे उस किसान के खेत में हमने उतने ट्रक मिट्टी डाल दी। इस प्रकार बिना सरकारी सहायता के तालाब भी गहरा हो गया और सभी किसानों की फसल भी दुगनी हो गई। हमने अनुपमजी को फोन किया । अनुपम जी ने इस किस्से को गांधी – मार्ग में छापकर हमें आशीर्वाद दिया ।

एक और घटना 2010 में घटी। एक ठेकेदार हमारे गांव में आयां उसने कहा मुझे आपके गांव से लेकर अगले गांव यानी 6 किलोमीटर तक सड़क बनाने का ठेका मिला है। और उसके लिए मैं आपके गांव की ही एक सरकारी जमीन से मुरुम, मिट्टी, पत्थर निकालकर सड़क पर डालूंगा । हमारे गांव के सरपंच और लोगों ने उन्हें रोक दिया। और ठेकेदार को समझाया कि जिस जगह से आप मुरुम, मिट्टी, पत्थर निकालकर डालना चाहते हैं वह हमारे गांव का ऊपरी हिस्सा है। पठारी इलाका है। यदि आप यहां से मुरुम, मिट्टी, पत्थर की खुदाई करेंगे तो हमारे गांव का पर्यावरण भी बिगड़ जाएगा और उससे हमारे गांव को कुछ फायदा नहीं होगा । तो हमारे गांव के अंदर की एक जमीन हम देते हैं । हम आपको एक और सरकारी जमीन बताते हैं जहां से आप मुरुम, मिट्टी, पत्थर निकालकर अपनी सड़क पर डाल सकते हैं। इससे हमारे गांव में एक तालाब का निर्माण हो जाएगा और आपकी सड़क भी बन जाएगी। ठेकेदार ने सरपंच से कहा कि इसके लिए तो मुझे सरकारी
अनुमति की जरूरत पड़ेगी और सरकार इसकी अनुमति कभी नहीं देगी। सरपंच और गांव के लोगों ने कहा कि हमारे गांव की हम सरकार हैं। हमें और किसी सरकार की, किसी कलेक्टर की अनुमति की जरूरत नहीं है। हम आपको लिखकर देंगे कि आप यहां से मिट्टी और पत्थर निकालिए। गांव वालों से लिखित अनुमति मिलने की बात से ठेकेदार तैयार हो गया। गांव के सरपंच और लोगों ने ठेकेदार को लिखकर दिया और ठेकेदार ने तीन महीने उस स्थान पर मशीनें लगाकर हजारों ट्रक मुरुम, मिट्टी और पत्थर निकाले और सड़क पर डाले । उसकी सड़क भी बन गई और गांव में एक बहुत बड़े तालाब का निर्माण भी हो गया ।

यह काम गर्मी के महीनों में हुआ था। बरसात का मौसम आने पर जब यह तालाब पूरा भरा तो गांव वालों ने कहा कि 200 साल बाद हमने इतना पानी इस गांव में देखा है। ठेकेदार को बहुत खुशी हुई और वे प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के पब्लिक वर्क्स के अधिकारी बी. एल. कडू को लेकर आए। गांव वालों के साथ उनकी मीटिंग रखी गई। ठेकेदार ने मीटिंग में बताया कि गांव वालों के कहने के अनुसार काम करने पर सड़क के साथ ही इतने बड़े तालाब का भी निर्माण हो गया है । इससे इस गांव के कई कुंओं में पानी आ गया है।

कुछ दिन बाद पूना में पी. डब्ल्यू. डी. विभाग की रोड कांफ्रेंस हुई। यह सम्मेलन हर वर्ष होता है। इस सम्मेलन में देश भर के इंजीनियर, ठेकेदार भाग लेते हैं । कडूजी ने इस सम्मेलन में वलनी गांव का पेपर पढ़ा। इसमें उन्होंने बताया कि किस तरह गांव वालों की सूजबूझ से और ठेकेदार की मदद से वलनी गांव में न सिर्फ सड़क बनी एक बड़े तालाब का भी निर्माण हो गया। इस सम्मेलन पीडब्ल्यूडी विभाग के मंत्री श्री नितिन गडकरी भी उपस्थित थे । वे इस घटना से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने तुरंत केंद्र सरकार की जल-सरोवर योजना की घोषणा कर दी । और उसके अंतर्गत जितने भी अन्य विभाग हैं, अभियंता हैं, ठेकेदार हैं उन सबको निर्देश दिया कि देश में जहां-जहां भी सड़कें बन रही हैं वहां ठेकेदारों को पहाड़ और पठार नहीं काटने हैं। गांव के आसपास की ऐसी जमीन चुननी है जहां पर तालाब का निर्माण भी हो जाए और सड़क भी बन जाए ।

वलनी गांव की इस घटना को अनुपम जी ने फरवरी 2012 में ‘गांधी – मार्ग’ में छापा था। इसके बाद हम भी भूल गए। लेकिन पिछले तीन-चार सालों में नितिन गडकरीजी तो खुद मीडिया को इतना बता रहे हैं कि हमारा विभाग इतने तालाब खोद रहा है। पूरे देश में हजारों तालाब हमने बना दिए हैं। नीति आयोग ने उनकी प्रशंसा भी की है और उनकी इस योजना को पूरे देश में लागू कर रहा है।

इस प्रकार आज पूरे देश में वलनी का फार्मूला चल रहा है। इस तरीके से पूरे देश में तालाब बन रहे हैं । अनुपम जी ने जो कहा था कि बिना पैसे के तालाब बनाना है। बात मुझे उस समय समझ में नहीं आती थी । लेकिन अब समझ में आने लगा है कि बिना पैसे के भी तालाब बनाए जा सकते हैं। ग्रामीण अपनी सूजबूझ से यदि इस तरीके से काम करें और उनके गांव में जो सरकार के ठेकेदार आते हैं उनसे बात करें। विकास को कोई नहीं रोक सकता। लेकिन विकास के साथ-साथ यदि विवेक का इस्तेमाल हो जाए तो परिणाम अच्छे आ सकते हैं। इसके उदाहरण अब कई जगह मिल रहे हैं।

उसके बाद एक दिन मैंने अनुपम जी से पूछा कि तालाब मर क्यों रहे हैं ? 1952 की गणना में देश में तालाबों की संख्या 25 लाख थी । आज उनकी संख्या घटकर मात्र ढाई लाख रह गई है। धीरे-धीरे ये तालाब लुप्त क्यों हो रहे हैं ? हम उनके प्रति इतने उदासीन क्यों हैं ? कहां जा रहे हैं ? अनुपम जी ने कहा, “इन तालाबों को बिजली राक्षस खा गया ।” हमें बात समझ नहीं आई। उन्होंने बताया कि, जैसे-जैसे खेतों में बिजली पहुंच गई वैसे-वैसे बोर – वेल्स लगने लगे और तालाबों की जरूरत खत्म होती चली गई। क्योंकि बिजली के कारण बहुत आसानी से जमीन से पानी आने लगा । हमने इसका इलाज पूछा तो उन्होंने कहा कि बोर वेल वाले पानी की चोरी कर रहे हैं। जो पानी वे जमीन से खींच रहे हैं वह उनके द्वारा जमीन में नहीं डाला गया है। वह तो लाखों वर्षों से जमीन में इकट्ठा हुआ पानी है, समाया हुआ पानी है। आसपास के सभी गरीब किसानों का पानी अमीर किसान बोर बैल के द्वारा खींच रहे हैं। इसमें सिर्फ टेक ही टेक है जिसका कोई री-टेक नहीं है। यानी कि ये दस-बीस साल और चलेगा। जमीन में जो पानी लाखों बरसों से जमा हुआ था बोर-वेल वाले खींच – खींच कर निकालते जा रहे हैं। भीष्म पितामह के शरीर में जितने तीर घुस गए थे उतने ही बोर – वेल्स आज हमारी धरती मां की शरीर में घुस गए हैं। अब हमारे पुण्य खतम हो रहे हैं । “

उन्होंने कहा कि, “दस-बीस बरसों में तो ये बोर – वेल्स भी सूख जाएंगे और फिर हम सभी मरेंगे। हमने इस समस्या का हल पूछा तो उन्होंने कहा कि इसका एक ही हल है हर बोर वेल वाले के लिए उसके खेत की दस प्रतिशत जमीन पर तालाब बनाना अनिवार्य कर दिया जाए। शहर में जिन लोगों के पास बोर – वेल्स हैं गरीब किसानों को उनकी जमीन तालाब बनाने के लिए उपलब्ध करा दी जाए। इस तरह आज जितने करोड़ बोर – वेल्स हैं उतने करोड़ तालाब बन जाएंगे। इस तरह से समाज कभी भी नहीं डूबेगा ।”

इस पर अभी काम शुरू भी नहीं हुआ था कि अनुपम जी का साथ छूट गया । धीरे-धीरे अनुपम जी की उपलब्ध सामग्री से तीसरे फार्मूले की जमीन तैयार कर रहे हैं। जिससे अनुपम जी की कृति ‘आज भी खरे हैं तालाब’ को जमीन पर उतार सकें । बहुत सारे मित्र, बहुत सारे सहयोगी जगह-जगह पर अनुपम जी की इस कृति को साकार करने में जुटे हुए हैं ।

  • जनसुलभ पुस्तकालय, बिलासपुर द्वारा 19 से 26 दिसंबर 2020 तक आयोजित अनुपम स्मृति व्याख्यान माला में 24 दिसंबर को दिया गया श्री योगेश अनेजा का वक्तव्य ।

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