मधुमक्खी पालन हिंदी में

भारत में मधुमक्खी पालन (एपिकल्चर) का चलन बढा है। अनेक लोग इसे व्यवसाय के रूप में अपनाना चाहते हैं. मधुमक्खी पालन आय का एक अतिरिक्त स्रोत तोहोने के साथ ही साथ परागण के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। खेती के साथ मधुमक्खी पालन करने से फसल की पैदावार आसानी से 25 प्रतिशत तक बढ़ जाती है. शहद अपने आप में एक स्वस्थ प्राकृतिक भोजन और विभिन्न बीमारियों के लिए एक उपयोगी दवा है। रॉयल जेली, पराग, मोम कुछ अन्य मूल्यवान मधुमक्खी उत्पाद हैं।

मधुमक्खी पालन व्यवसाय फायदेमंद और पर्यावरण के अनुकूल तो है ही साथ ही साथ ये बेहद दिलचस्प भी है। मधुमक्खी की कड़ी मेहनत, श्रम विभाजन, समन्वय और टीम वर्क प्रेरणादायी है। यह लेख उनके लिए मददगार हो सकता है जो इसे शौकिया या व्यवसायिक रूप से अपनाना चाह रहे हैं पर उनको इसकी शुरुवात कैसे और कहाँ से की जाये ये समझ नहीं आ रहा है।

मधुमक्खी पालन से सम्बंधित कुछ जरुरी बातें

शहद में पानी 20%, ग्लूकोस 33, फ्रक्टोस 38 और 9% अन्य पदार्थ होते हैं।

कच्चे शहद (raw), जैविक (organic) शहद और मनुका शहद में क्या अंतर है?

आमतौर पर रोगजनकों को मारने के लिए शहद को 145 डिग्री फ़ारेनहाइट से ऊपर गरम (पाश्चराइज) किया जाता है. रॉ शहद वह है जिसे पाश्चराइज नहीं किया जाता है। रॉ शहद आमतौर पर सीधे छत्ते से निकला हुआ अनफ़िल्टर्ड, असंसाधित शहद है । यह जैविक हो भी सकता है और नहीं भी। जैविक (ऑर्गेनिक) शहद का मतलब है कि शहद में कुछ भी सिंथेटिक नहीं है। मतलब इस पर किसी उर्वरक, कीटनाशक, रंजक, सॉल्वैंट्स या विकिरण नहीं किया गया है। अगर कार्बनिक शहद को पास्चुरीकृत किया गया है तो ये कार्बनिक तो है पर कच्चा नहीं.

मनुका शहद अपने स्वयं में एक अलग प्रकार है. मनुका शहद एक मोनोफ्लोरल शहद है। मतलब, कि मधुमक्खियाँ केवल एक प्रकार के फूल से पराग लेती हैं और यह मनुका झाड़ी (लेप्टोस्पर्मम स्कोपेरियम) पर उगती है, जिसे टी ट्री भी कहा जाता है.  यह न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया के कुछ हिस्सों में पाया जाता है। इसमें साल में केवल कुछ ही हफ्ते फूल आते हैं। इस शहद को इसकी प्रबलता के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है। इसके कई ग्रेडिंग सिस्टम हैं. जिनमे से यूएम्ऍफ़ (UMF) रेटिंग प्रणाली सबसे प्रसिद्ध और विश्वसनीय मणि जाती है। एमजीओ एक और ग्रेडिंग सिस्टम है। मेडिकल ग्रेड मनुका शहद का इस्तेमाल डॉक्टर कुछ ऐसे संक्रमणों के लिए करते हैं जिनको एंटीबायोटिक्स ठीक नहीं कर पातीं हैं.

मधुमक्खी पालन की शुरुवात कैसे करें?

ट्रेनिंग

किसी भी काम के लिए ट्रेनिंग जरुरी है. उससे न सिर्फ हम उस काम को करने की विधि समझते हैं बल्कि कोई टेक्निकल या अन्य व्यवधान आने पर हमें कहाँ संपर्क करना है ये भी पता लग जाता है. खादी एंड विलेज इंडस्ट्रीज कारपोरेशन (KVIC) भारत में मधुमक्खी पालन को बढ़ावा देता है। ये संस्थान न केवल प्रशिक्षण देता है बल्कि इसके लिए वित्तीय सहायता भी प्रदान करता है (25 लाख तक) जो कि उन युवा एंटरप्रेन्योर के लिए ऋण के गारंटर के रूप में कार्य करते हैं जो पूरे समय मधुमक्खी पालन करना चाहते हैं.  इसके अलावा केवीआईसी शहद को खरीदता व् लघु ग्राम उद्योग के माध्यम से बेचता भी है.

मधुमक्खी पालन में कितना खर्च आता है? और मदद कहाँ से मिल सकती है?

सबसे पहले इस उद्यम में कितना धन लगाना होगा और उससे शुरुवाती दिनों में और बाद में कितने मुनाफा होने की संभावना है इसका एक अनुमान लगा लेना चाहिए.

एक शुरुआती के रूप में मधुमक्खी पालन में आपका अधिकांश खर्च किट, किताबें और हनी कॉलोनी और बॉक्स खरीदने के लिए जाता है। यह उद्यम महंगा नहीं है। बल्कि यह सस्ता है और इस पर अगर लम्बे समय तक टिका जाये तो इसके शानदार रिटर्न है। खास बात यह है कि केंद्रीय और राज्य के विभिन्न विभाग इस उपक्रम के लिए अलग अलग तरह से मदद करते हैं.

मधुमक्खी पालन कम से कम २ बक्सों से करना चाहिए. सब कुछ मिला कर के एक बॉक्स की कीमत ४००० से ५००० रु तक पड़ती है. एक बॉक्स से २५ से ३० किलो ग्राम शहद मिलता है. अगर २०० रु प्रति किलो की दर से इसको बेचा जाता है तो एक खेप में ही बॉक्स की कीमत निकल जाती है. यह बॉक्स सामान्यतः आठ से दस साल तक चलता है.

एक भावी उद्दमी के लिए जानने लायक बात यह है कि अगर आप 100 किग्रा से कम उत्पादन करेंगे  तो मुनाफा नहीं होगा. उत्पादन की लागत के रूप में – मधुमक्खियों की लागत, बॉक्स और फ्रेम को बनाए रखने, श्रम और परिवहन आदि का मूल्य 40-50 किलोग्राम शहद के बराबर पड़ता है।

मधुमक्खियों की कौन सी प्रजातियाँ इस काम के लिए उपयुक्त हैं?

छोटी मक्खी (अपिस फ्लोरिया) और भंवर (अपिस डोरसाटा) को नहीं पाला जाता। केवल मंझोली जाति जिसे भारतीय मौन (अपिस इंडिका) एवं विदेशी (अपिस मेलिफरा) कहते हैं को बक्सों में पला या बसाया जा सकता है. ये आपको मधुमक्खी पालकों या प्राकृतिक रूप से झाड़ियों / पेड़ों से मिल सकतीं हैं।

कौन सा मौसम मधुमक्खी पालन के लिए उपयुक्त है?

बसंत (फ़रवरी – मार्च) का मौसम मधुमक्खी पालन के लिए सबसे उपयुक्त होता है. बसंत के मौसम में काफ़ी फल होते हैं और मधुमक्खियों को बसाने में सुविधा होती है। बक्से में हर 10 दिन में मधुमक्खियों की जाँच करनी जरुरी होती है ताकि मधुमक्खियों के दुश्मनों और कमेरी मक्खियों के काम काज की पूरी जानकारी मिलती रहे।

मधुमक्खी पालन शुरू करने के लिए सहायता कहाँ से मिल सकती है?

एकीकृत बागवानी विकास मिशन (मिशन फॉर इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ़ हॉर्टिकल्चर- MIDH) के अंतर्गत आने वाले नेशनल हॉर्टिकल्चर मिशन (NHM) और हॉर्टिकल्चर मिशन फॉर नार्थ ईस्ट एंड हिमालयन स्टेट्स (HMNEH) कि विभिन्न योजनाओं के माध्यम से इससे सम्बंधित लाभ लिए जा सकते हैं। परागण सपोर्ट के लिए मधुमक्खी पालन को बढाने के उद्देश्य से इन योजनाओं से आधे दाम (५०%, ८०० रु) पर मधुमक्खी की कॉलोनी और आधे दम पर (५०%, ८०० रु) पर बी हाइव (छत्ता) मिलते हैं. एक लाभार्थी को मधुमक्खी की अधिकतम ५० कॉलोनियां इन योजनाओं के अंतर्गत मिल सकती हैं।  https://rkvy.nic.in/static/schemes/Horticuluture.html

शहद को कहाँ बेचा जा सकता है?

यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप इसे कैसे बेचना चाहते हैं। यदि आप अपनी खुद की पैकेजिंग और लेबलिंग करते हैं, तो इसे स्थानीय बाजार में वैध एफएसएसएआई नंबर के साथ बेच सकते हैं। आप इसे किसी भी स्थानीय सुपरमार्केट के साथ भी जोड़ सकते हैं। थोक में बेचने के लिए भी कई कंपनियां हैं और इकाइयाँ हैं जो मधुमक्खी पालकों से शहद इकट्ठा करती हैं। स्थानीय मधुमक्खी पालकों का संघ बना कर खादी ग्राम उद्योग के माध्यम से इसको बेचना भी काफ़ी लोकप्रिय है.

कुछ महत्वपूर्ण लिंक

National Bee Board https://nbb.gov.in/

http://www.kvic.gov.in/kvicres/index.php

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