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मैं शाकाहारी हूं। पर जरा उस तरह की शाकाहारी हूं जो मौका पड़ने पर शाकाहार का गुणगान या कहें तो उसका विज्ञापन अपने सामिष मित्रों के सामने करने से बाज नहीं आते! निरामिष होना एक किस्म की श्रेष्ठता का भाव जगाता है। मैंने शाकाहारी होने का चुनाव नहीं किया था। यह खाने पीने की पारिवारिक पृष्ठभूमि से मुझे विरासत में मिल गया था।

शाकाहार का गुणगान अक्सर ही मेरे और मेरे सामिष मित्रों के बीच तर्क-वितर्क बहस में बदल जाता है। सामिष भोजन के पक्षधरों का तर्क बड़ा विचित्र होता है। वे तो कहते हैं कि पेड़ पौधे तो वायुमंडल से जहरीली कार्बन डाई ऑक्साइड गैस को ग्रहण करने जैसा भला काम करते हैं। अतः उनको खाने से या उनको नष्ट करने से तो नुकसान ही होगा। इसके उलटे चूजे और मेमने या बकरे आदि तो पर्यावरण की दृष्टि से कोई महत्व नहीं रखते। वे तो पैदा ही इसलिए हुए कि एक दिन स्वादिष्ट भोजन बन सकें! इसलिए शाकाहार-मांसाहार की बहस में पड़े बिना उनको खा लेना ही ज्यादा उचित है!

ऐसी विचित्र बातों को तो किनारे ही रखें। इधर कई ऐसे नए अध्ययन सामने आए हैं जो सामिष भोजन के कार्बन फुट प्रिंट्स को निरामिष से ज्यादा बता रहे हैं। सामिष के पक्षधरों या मेरे हिसाब से कुतर्कधरों को ये कुछ नई बातें भी जान ही लेना चाहिए। पर पहले तो हम इस ‘कार्बन फुट प्रिंट्स को जरा समझ लें। जलवायु परिवर्तन जैसे खतरों को समझाने के लिए जो नई शब्दावली विकसित हुई है ये उसका एक प्रमुख शब्द या कहें तो एक सदस्य है – कार्बन फुट प्रिंट। फुट प्रिंट का सीधा सादा हिंदी अनुवाद है : पद्चिन्ह या छाप। पर यह प्रयोग अच्छे अर्थों में आता है। अपने समाज में या अपने क्षेत्रा में किसी व्यक्ति ने कोई सुंदर काम किया हो तो कहते हैं कि उनकी छाप यहां छूटी है। उनके पदचिन्हों पर हमें आगे बढ़ना है आदि। पर विज्ञान की दुनिया में, बदलते मौसम की, जलवायु परिवर्तन की भाषा में कार्बन शब्द जुड़ जाने से इस पद्चिन्ह का अर्थ एकदम उलटा हो जाता है। वह उदात्त या अच्छे योगदान के बदले कुप्रभाव के अर्थ में बदल जाता है। फिर पर्यावरण विज्ञान में इस्तेमाल होने वाला ‘कार्बन फुट प्रिंट’ मनुष्य का भी हो सकता है, उत्पादों, संस्थाओं और देशों तक का भी। दुनिया भर में इन्द्रियों द्वारा पहचानने योग्य जितनी भी चीजें मौजूद हैं, उन सबका एक कार्बन फुट प्रिंट माना गया है। इस कार्बन फुट प्रिंट को एक व्यक्ति के संदर्भ में कैसे देखा जाए? इसे सरल ढंग से समझना हो तो कहा जाएगा कि इस व्यक्ति ने अपने पूरे जीवनकाल में भूमंडल में व्याप्त ग्रीन हाउस गैसों को बढ़ाने में व्यक्तिगत रूप से कितना असर डाला है। भोजन के संदर्भ में इसका आशय यह हुआ कि जिन सब अवयवों से मिलकर वह भोजन बना है, उन अवयवों की पैदावार से लेकर कटाई – छटाई, फिर एक स्थान से दूसरे स्थान पर ढोना, लाना, उसके परिवहन से लेकर पकाने और पचाने योग्य बनाने के पूरे सफर में या दूसरे शब्दों में कहें तो उसके पूरे जीवन काल में उसके द्वारा वायुमंडल में छोड़ी गई ग्रीन हाउस गैस की मात्रा कितनी है? कुल मिलाकर कार्बन फुट प्रिंट, कार्बन पदछाप एक तुलनात्मक मापक भी है। अगर अ नामक किसी चीज का कार्बन पद्छाप उत्पाद ब से ज्यादा है तो इसका मतलब यह हुआ है कि अपने कुल जीवन काल में उत्पाद अ उत्पाद ब की तुलना में ज्यादा ग्रीन हाउस गैसों को वातावरण में उत्सर्जित करता है। सामिष भोजन के कार्बन पदछाप ज्यादा होने का मतलब है कि ऐसे व्यंजन, ऐसा खाना निरामिष भोजन की तुलना में ज्यादा मात्रा में ग्रीन हाउस गैसें छोड़ते हैं।

अब बात पर्यावरण की शब्दावली के लोकप्रिय शब्द – ग्रीन हाउस गैसों की । सूर्य के द्वारा उत्सर्जित विद्युत चुंबकीय तरंगें जब धरती की सतह से टकराती हैं तो उष्मीय अवरक्त किरणें इन्फ्रारैड किरणें निकलती हैं। ये टकराकर फिर धरती की सतह से वापस ऊपर को लौटती हैं। परंतु ये किरणें धरती के वायुमंडल में उपस्थित कुछ ‘ग्रीन हाउस गैसों’ द्वारा सोख ली जाती हैं। फिर वापस हर एक दिशा में फेंक दी जाती हैं। इस दौरान इन किरणों का एक भाग वापस धरती की तरफ रुख कर लेता है। इससे धरती का औसत तापमान बढ़ जाता है। वैसे धरती में मौजूदा जीवन को संभव बनाने के लिए जिस तापमान की जरूरत होती है, उस तापमान को बनाए रखने का श्रेय भी इन्हीं गैसों को जाता है। सतत् वैज्ञानिक शोधों से निकले आंकड़े बताते हैं कि अगर ये गैसें वातावरण में नहीं हों तो धरती का औसत तापमान शून्य से 18.1 डिग्री नीचे होता जो कि वास्तविक औसत तापमान 14.4 डिग्री सेंटीग्रेट से 32.5 डिग्री सेंटीग्रेट कम है। इस संतुलन के कारण ही धरती में जीवन के लिए आवश्यक तापमान की मौजूदगी बनी रहती है। इसे यही गैसें सुनिश्चित करती हैं। वातावरण में ग्रीन हाउस गैसों की सघनता इनके उत्सर्जन की मात्रा तथा वायुमंडल से इनकी निकासी की दर के बीच के इसी संतुलन पर निर्भर करती हैं। संतुलित कुल भंडार में आवक-जावक तो लगी ही रहती है। इस आवक-जावक में प्रकृति भी शामिल है और मानव की गतिविधियां भी। यदि ये गैसें हमारी पृथ्वी पर न होतीं तो इनकी अनुपस्थिति धरती पर अभी के जैसे जीवन को असंभव बना देती। दूसरी तरफ इनकी अधिक मात्रा में उपस्थिति भी भयावह है। इनकी सघनता के बढ़ने का सीधा मतलब है धरती के तापमान का उस औसत से ज्यादा होना जो औसत बिंदु हमारे कुल जीवन को टिकाता है।

हम सबने मिलकर पिछले दौर में इतने सारे खराब काम किए हैं कि ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में अभूतपूर्व बढ़ोत्तरी हो गई है। वायुमंडल में इनकी मात्रा में भयानक वृद्धि हुई है। इसका सीधा असर धरती के तापमान में लगातारबढ़ोत्तरी के रूप में सामने आ रहा है। परेशानी इतनी बढ़ी कि दुनिया भर के देश इस ‘ग्लोबल वार्मिंग’ नामक दैत्य से कैसे निपटें- ये समझ ही नहीं पा रहे।

जलवायु परिवर्तन का सबसे खतरनाक उदाहरण है तापमान का बढ़ते जाना। इसी कारण पूरी दुनिया के हिमखंड पिघलने लगे हैं तथा महासागरों समुद्रों के स्तर में बढ़ोत्तरी का डर फैलने लगा है। जिस सागर के बारे में माना जाता था कि वह अपनी मर्यादा नहीं तोड़ता कभी, अब तो हर तट पर वह मर्यादा भंग करता हुआ दिख रहा है।

दुनिया भर में सबसे ज्यादा मात्रा में उत्सर्जित ग्रीन हाउस गैस कार्बन डाई ऑक्साइड है। यह जीवाश्म ईंधन जैसे कोयला, यातायात में प्रयोग होने वाला पैट्रोल तथा डीजल और नेचुरल गैस से निकलती है। इसके बाद मीथेन गैस का नंबर आता है। मात्रा कम पर इसका असर ज्यादा है। भूमंडल के तापमान को प्रभावित करने की इसकी क्षमता कार्बन डाई ऑक्साइड के मुकाबले 25 गुना ज्यादा है। बताया जाता है कि धान के खेत इसका एक बड़ा स्रोत हैं। घरेलू पशु जैसे की गाय, भैंस, बकरी, भेड़ आदि भोजन पचाने के दौरान काफी मात्रा में मीथेन गैस छोड़ते हैं – ऐसा भी बताया जाता है। बड़े शहरों के कचरा भराव क्षेत्र भी मीथेन पैदा करने का एक अड्डा हैं। इन सभी स्रोतों से इस गैस के उत्सर्जन के पीछे इन जगहों पर मौजूद ऐसे बहुत ही सूक्ष्म जीव भी हैं, जो पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन मौजूद न होने की स्थिति में कार्बनिक पदार्थों को तोड़कर अपना भोजन बना लेते हैं। इस प्रक्रिया में भी काफी मात्रा में मीथेन गैस निकलकर हमारे वातावरण में पहुंच जाती है।

कार्बन डाई ऑक्साइड और मीथेन पर ही मामला खत्म नहीं हो जाता। दुनिया भर के तापमान को बढ़ाने में इस मीथेन से भी 300 गुना ज्यादा प्रबल नाइट्रस ऑक्साइड गैस है। यह कहां से पैदा होती है? इसका मुख्य स्रोत कृषि तथा औद्योगिक इकाइयां हैं। फिर शीतल करने के लिए उपयोग में आने वाली विभिन्न गैसें भी ग्रीन हाउस गैसों की श्रेणी में आती हैं। इनकी प्रबलता कार्बन डाई ऑक्साइड से हजारों गुना ज्यादा बताई गई है।

अलग-अलग प्रक्रियाओं में कई सारी ग्रीन हाउस गैसें फैलती हैं। इन गैसों की मारक शक्ति, प्रबलता को कार्बन डाई ऑक्साइड के प्रभाव के रूप में तौला जाता है। इसका मतलब है कि एक प्रक्रिया में निकली कई तरह की ग्रीन हाउस गैसें भूमंडल के तापमान को प्रभावित करने की जो क्षमता रखती हैं, वही प्रभाव अगर अकेले कार्बन डाई ऑक्साइड से नापना हो तो उसकी जितनी मात्रा की जरूरत होगी उसको आंका जाता है। कार्बन डाई ऑक्साइड की यही मात्रा उस प्रक्रिया का कार्बन फुट प्रिंट कहलाती है। भोजन के संदर्भ में एक खाद्य पदार्थ द्वारा दूसरे की तुलना में कार्बन डाई ऑक्साइड कितनी ज्यादा या कम पैदा हुई, इसी आधार पर वह पर्यावरण के लिए ज्यादा या कम उपयुक्त माना जा सकता है।

कई तरह के अध्ययनों ने विभिन्न खाद्य पदार्थों और व्यंजनों के कार्बन फुट प्रिंट्स निधारित किए हैं। ये शोध ऐसा बताते हैं कि बकरे के गोश्त से बने व्यंजन द्वारा अपने जीवनकाल में दूध की तुलना में कोई 12 गुना, मछली से बने व्यंजन की तुलना में लगभग 12 गुना, चावल की तुलना में 13 गुना और रोटी की तुलना में कोई 37 गुना ज्यादा ग्रीन हाउस गैसें निकलती हैं। एक आकलन के मुताबिक एक बार का भोजन जिसमें बकरे के गोश्त से बनी कोई एक चीज हो वह एक बार के निरामिश भोजन, जिसमें गोश्त की जगह अंडों ने ले ली हो से 1.5 गुना ज्यादा और दूध युक्त निरामिष शाकाहारी भोजन की तुलना में 1.4 गुना ज्यादा ग्रीन हाउस गैसें उत्सर्जित करता है।

भूमंडल में उत्सर्जित कुल ग्रीन हाउस गैसों में से 14 प्रतिशत के लिए वैज्ञानिक हमारी कृषि को जिम्मेवार ठहराते हैं। फिर कृषि के भीतर भी इन गैसों का सबसे बड़ा स्रोत पशुधन बताया गया है-लगभग 40 प्रतिशत। इनमें पाचन के दौरान मीथेन गैस पैदा होती है और डकार के माध्यम से वातावरण में पहुंच जाती है। एक बड़ी प्रसिद्ध संस्था हैः इंटरनेशनल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज। इसने अपनी इसी साल प्रकाशित पांचवीं रिपोर्ट में ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा में कमी लाने के लिए ऐसे भोजन की मांग को बढ़ाने की बात कही है, जिसके द्वारा ग्रीन हाउस गैसों का कम से कम मात्रा में उत्सर्जन होता हो। रिपोर्ट के अनुसार सामिष से निरामिष की तरफ, मांसाहार से शाकाहार की तरफ प्रस्थान एक ऐसा महत्पूर्ण बदलाव है, जिससे इन घातक गैसों की मात्रा में काफी कमी आ सकती

है। यह संस्था संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्वावधान में काम करती है। इसे अपने कामों के कारण नोबल पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। इस संस्था ने यह भी अपील की है कि पूरी तरह शाकाहारी न बन पाए कोई व्यक्ति, कोई समाज, कम-से-कम हफ्ते में एक दिन तो वह मांस जरूर छोड़े।

निरामिष, शाकाहारी भोजन पर्यावरण की नजर से भी सामिष, मांसाहार के मुकाबले बीस ही ठहरता है, उन्नीस नहीं। सारे वैज्ञानिक और ऊंची संस्थाओं की रिपोर्ट-सब इसी तरफ तो इशारा कर रही हैं।

अब हमारे सामिष मित्रों को इससे ज्यादा क्या दलील दी जाए। आप बताएं।

  • यह लेख मूलतः ‘गांधी मार्ग’ पत्रिका के सितंबर- अक्तूबर 2014 के अंक में छपा था
One thought on “शाकाहार के बहाने”
  1. बहुत उत्कृष्ट आलेख है… शाकाहार को लेकर कई वैज्ञानिक जानकारियाँ प्राप्त हुई.

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