राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने ६ राज्यों को निर्देश दिये कि वे अपनी वायु गुणवत्ता मापकों को सुधार कर उसे सामान्य स्तर (नियत मानकों के अंदर) पर लाने के लिए अपनी कार्य योजनायेँ जमा करें। कार्य योजनाएँ जमा करने की आखिरी तारीख ३० अप्रैल है। यदि ये राज्य अंतिम तिथि तक अपनी कार्य योजना बताने में असमर्थ होते हैं तो उन्हें पर्यावरण को हुए नुकसान की क्षतिपूर्ति के तौर पर एक करोड़ रुपए देने होंगे। अधूरी कार्य योजनाएँ जमा करने वाले वे राज्य जो ३० अप्रैल से पहले अपनी जमा योजनाओं की कमियाँ ठीक नहीं कर पाते उनको भी २५ लाख रुपए जमा करने होंगे । बेंच ने कहा कि कार्य योजनाओं के साथ ही उसको अमल में लाने के लिए बजट में प्रावधान को भी सुनिश्चित करना होगा।

एन जी टी अध्यक्ष जस्टिस आदर्श कुमार गोएल की अध्यक्षता वाली पीठ ने असम, झारखंड, महाराष्ट्र, पंजाब, उत्तराखंड और नागालैंड सरकारों के मुख्य सचिवों को आदेश दिया कि निर्धारित समय सीमा के अंदर वे अपनी कार्य योजनाएँ जमा करें । कार्य योजना के फ़ाइनल होने के बाद राज्यों को उसको ६ महीने के अंदर अमली जमा पहनाना होगा ।

अधिकरण ने चेताया कि यदि राज्य अपनी योजनाओं को अमल करने में नाकामयाब होते हैं तो उनको पर्यावरणीय नुकसान की भरपाई के तौर पर जुर्माना भरना होगा । इसके अलावा केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की अनुषंशा के अनुरूप राज्यों को समय सीमा आगे बढ़वाकर काम को पूरा करने के लिए ‘परफ़ोर्मेंस गारंटी’ भी देनी पड़ सकती है ।

ज्ञात हो कि केंद्र सरकार जनवरी २०१९ में राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम) ले कर आई जिसका मुख्य उद्देश्य वर्ष २०२४ तक देश के कम-से-कम १०२ शहरों में हवा में मौजूद अति सूष्म पर्टिकुलेट मैटर पीएम २.५ और पीएम १० को २०१७ के मुक़ाबले २०-३० % तक कम करना है । यह एक शहरों पर केन्द्रित पँचवर्षीय कार्य योजना है। पाँच साल बाद इसके तहत हुई प्रगति की समीक्षा की जाएगी। कार्यक्रम को लाने से पहले देश भर के in १०२ शहरों को प्रदूषण के हॉटस्पॉट क्षेत्र के रूप में चिन्हित कर लिया गया था ।

राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण का मौजूदा निर्देश इसी सिलसिले में तब आया जब केन्‍द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने बताया कि इन १०२ में से केवल ८३ शहरों ने अब तक अपनी कार्य योजनाएँ जमा की हैं ।

राष्ट्रीय हरित अधिकरण अब इस मामले में १९ जुलाई को फिर से सोच विचार करेगी ।

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