how to grow mushroom in Hindi

मशरूम या खुम्ब या छतरी एक प्रकार का फंगस (बोल-चाल की भाषा में फफूंद) है। यह हमारे वनस्पति जगत के कवक समूह का अपुष्पी पौधा हैण् इसमें खनिज लवण, विटामिन,  कैल्सियम, अमीनो एसीड इत्यादि प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। मांसाहार का सेवन न करने वाले लोगों के लिए यह प्रोटिन का बहुत ही अच्छा स्रोत है। यह डायबिटिज एवं ह्दय रोगीयों के लिए काफी फायदेमंद है। मशरूम हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास करता है ।

विश्व में सबसे पहले 1751 में फ्रांस में इसकी खेती शुरू हुई थी । मशरूम के विषय में शोध करने के लिए हिमाचल प्रदेश के सोलन में एक शोध संस्थान की स्थापना भारत सरकार द्वारा सन 1961 में की गई । तब से लेकर अब तक इसके उत्पादन एवं गुणों पर काफी रिसर्च हुई है ।

मशरूम के प्रकार

वैसे तो पूरी दुनिया में 40000 किस्म के मशरूम पाये जाते हैं लेकिन उनमें से केवल 2000 प्रजातियां ही हम मनुष्यों के लिए खाने योग्य होतीं हैं  मुख्य रूप से ओएस्टर, बटन, ढ़िंगरी इत्यादि खाने योग्य प्रजातियां हैं । व्यावसायिक तौर पर हमारे देश में तीन प्रकार की मशरूम तापमान एवं वातारण के अनूकुल है- आयस्टर, बटन एवं पेडी स्ट्राॅ। इनमें से कम लागत एवं सरल तकनीक के कारण ओएस्टर मशरूम की खेती सबसे उपयुक्त मानी जाती है ।

मशरूम उत्पादन के लिए अनुकूल तापमान

मशरूम उत्पादन के लिए तापमान 20 से 25 डिग्री सेल्सियस एवं आर्दता 75-80 प्रतिशत आवश्यक है । अन्यथा मशरूम में अंकुरण संभव नहीं होगा ।

पौष्टिकता एवं ओषधीय गुण

इसमें फौलिक एसिड, विटामिन बी-1,12, विटामिन सी, सोडियम, पोटेशियम एवं सुपाच्य प्रोटिन की प्रचुर उपलब्धता है । यह हमारे शरीर की प्रतिरोधी क्षमता का भी विकास करती है जिससे हमें रोगों से लड़ने में काफी मदद मिलती है । कुल मिलाकर देखें तो हम कह सकते हैं कि मशरूम पौष्टिक एवं ओषधिय गुणों से भरपूर है ।

मशरूम उत्पादन में कितना खर्च आता है?

सामान्यतया मशरूम के उत्पादन में 50 से 60 रूपये प्रति बैग का खर्च आता है जिसमें पुआल, बीज, पालीथीन आदि का खर्च सम्मलित है.

प्रतिबैग लगभग 3 किलोग्राम का उत्पादन प्राप्त होता है । जिसका बाजार मूल्य लगभग 100 रूपये प्रति किग्रा0 होता है । इस प्रकार प्रतिबैग लगभग 240 रूपये का मुनाफा संभव है ।

एक 10 /10 के कमरे में 100 बैग लगाये जा सकते हैं जिसमें कुल निवेश 5000 रू0 आएगा। एक बार लगाया गया बीज तान बार फसल देता है

उत्पादन विधि

1.            लटकन या हैंगिंग विधि – इसमें पाॅलीथन बैग को रस्सी के सहारे छत से नीचे की ओर लटका कर उत्पदान लिया जाता है ।

2.            छज्जीनुमा आकृति – इसमें बांस की छोटी-छोटी खपच्चियों से बेंचनुमा स्ट्रक्चर तैयार कर एवं उसके उपर पालीथीन बैग को रख कर उत्पादन लिया जाता है । लेकिन लटकन विधि सस्ती होने के कारण ज्यादातर उपयोग में लायी जाती है ।

यहां पर हम हैंगिग या लटकन विधि से उत्पादन पर चर्चा करेंगे एवं सीखेंगे ।

आवश्यक सामग्री

1.            पालीथीन बैग

2.            धान या गेंहूं का पुआल की कटिंग (कुट्टी लगभग 1 से 1.5 इंच)

3.            बावस्टीन या कार्बनडाजीम

4.            फार्मलीन

5.            रस्सी लटकाने के लिए

6.            बीज या स्पान

7.            रबड़ बैंड या धागा. बांधने के लिए ।

8.            ड्राम लगभग 200 लीटर की क्षमता का ।

कुट्टी का निरजंतुकरण या स्टरलाजेशन

1.            उबालकर

2.            दवाईयों द्वारा (100 एम0एल फार्मलीन एवं 7 ग्राम बावस्टीन ।

पहली विधी में कुट्टी को पानी वाले ड्राम में डालकर पुरी उबाल आने तक उबालते हैं। ऐसा करने में लगभग 40 मिनट से एक घंटा तक लग जाता है एवं ईंधन की भी काफी खपत होती है । छोटे स्तर पर या घरेलू उपयेग के लिए या ग्रामीन क्षेत्रों में ऐसा करना संभव है  कयोंकि वहा ईंधन सुलभ और सस्ती है ।

दूसरी विधी में ड्राम में लगभग 200 लीटर पानी भरकर उसमें 100 एम0 एल0 फार्मलीन एवं 7 ग्राम कार्बनडाजिम या बावस्टीन डाल देते हैं । फिर कुट्टी को बोरे सहित ड्राम में डाल देते हैं । बोरा सहित डालने से कुट्टी को निकालने में आसानी होती है उसे छानना नहीं पड़ता । कुट्टी को 12 से 14 घंटे या रात भर पानी में डुबा रहने देते हैं । जिससे कुट्टी पानी सोंख लेती है तथा कुट्टी कीटाणुरहित हो जाती है ।

यहां ध्यान देने योग्य बात है कि जिस दिन स्पानिंग या बिजाई करनी हो उसके पहली रात को ही यह प्रक्रिया करनी है। दोनों ही विधियों में कुट्टी रात भर पानी में छोड़नी है।

निरजंतुकरण या स्टरलाजेशन करने के उपरांत सुबह कुट्टी को पानी से निकाल कर थोड़ी ढ़लान वाली जगह पर उपर की ओर बिछा देते है। कुट्टी बिछाने से पूर्व जमीन को अच्छी तरह से साफ कर लेना चाहिए नही नहीं तो कुट्टी में कीटाणु आ सकते हैं। अगर जमीन पक्की ना हो तो जमीन पर पालीथीन की चादर या शीट बिछा कर कुट्टी फैलाना चाहिए। ध्यान रहे कुट्टी को धूप में नहीं सुखाना है ।

एक से दो घंटे के अंतराल पर कुट्टी की जांच करते रहना चाहिए । कुट्टी बीजाई या स्पानिंग के काबिल है या नहीं इसकी जांच करने के लिए कुट्टी को अपने हथेली में रखकर दोनों हाथों से दबाना चाहिए। अगर पानी की धारा टपके तो समझें कि अभी और सुखाना पड़ेगा, अगर पानी ना टपके सिर्फ हथेली भींगे तो समझें कि कुट्टी स्पानिंग या बीजाई के लिए तैयार है ।

पालीथीन बैग का निरजंतुकरण या स्टरलाजेशन

अब पालीथीन बैग का निरजंतुकरण या स्टरलाजेशन 10 लीटर पानी में 10 एम0एल0 फार्मलीन डालकर उस पानी में पालीथीन बैग को कुछ देर (लगभग दो से तीन घंटे) तक डूबा रहने देते हैं ।  इस प्रक्रिया में पालीथीन बैग से सभी प्रकार के कीटाणु नष्ट हो जाते हैं ।

स्पानिंग या बीजाई

अब कुट्टी की एक परत लगभग दो से ढाई इंच पालीथीन बैग में बिछाते हैं एवं उसके उपर बीज को डाल देते हैं। फिर एक परत कुट्टी बिछाकर बिजाई करते हैं । इसी प्रकार पालीथीन बैग भरने तक इस प्रक्रीया को दुहराते रहते हैं । ध्यान रहे उतना ही भरना है ताकि पालीथीन बैग का उपरी भाग बांधने लायक रहे । पालीथीन बैग भर जाने के बाद कुट्टी को अच्छी तरह से दबा देना चाहिए जिससे कुट्टी आपस में सट जाए । अब पालीथीन बैग का उपरी सिरा रबड़ बैंड या धागे से अच्छी तरह से बांध देना चाहिए ।

अब रस्सी की सहायता से पालीथीन बैग को छत से लटका देते हैं । अगले दिन पाॅलीथन बैग में सुई की सहायता से छेद कर देते हैं । बीजाई के तीन चार दिन बाद बैग में सफेद धारीयां दिखाई देने लगती है ं। 12 से 15 दिनों में बैग 80 प्रतिशत सफेद दिखाई देने लगता है। तब पालीथीन बैग में ब्लेड का सहायता से चीरा लगा देते हैं । चीरा लगाने के एक दिन बाद स्प्रेयर की मदद से पानी का छिड़काव दो से तीन बार करते हैं । लगभग 21 से 22 दिनों के बाद मशरूम की कली दिखाई देने लगती है एवं दो से तीन दिन बाद फसल तुड़ाई के तैयार हो जाती है । अब कैंची या धागे की मदद से मशरूम को काट लेते हैं या हाथों से घुमाकर तोड़ते हैं । ऐसा करने से मशरूम की जड़ रह जाती है। पहली तुड़ाई के बाद बैग में बचे कुट्टी को उपर नीचे कर देते हैं एवं तीन से चार घंटे के बाद पानी स्प्रे कर देते हैं । इसके लगभग 7 दिनों बाद फिर बैग में मशरूम की कली दिखाई लगती है । और दसवें दिन तुड़ाई के लायक हो जाती है । इस प्रकार पहली फसल 25 से 26 दिनों में दुसरी फसल लगभग 35 दिनों एवं तीसरी फसल 45 दिनों में प्राप्त हो जाती है ।

अगर ताजा मशरूम उपयोग में नहीं ला पाये तो मशरूम को सुखाकर भविष्य में उपयोग किया जा सकता है । ऐसा करने से इसके अंदर के विटामिन और प्रोटीन बर्बाद नहीं होते । सुखाने की विधि नीचे बताई जा रही है ।

मशरूम सुखाने की विधि

धूप में एक सफेद चादर या अल्यूमिनीयम की शीट बिछाकर उसके उपर मशरूम की पतली परत बिछाकर लगभग छः से सात घंटे सुखाते हैं । इस प्रकार सुखाने से मशरूम के अंदर का पानी निकल जाता है । सुखाने के बाद सुखे हुए मशरूम को पालीथीन के छोटे-छोटे बैग में पैक कर लेते हैं । पैंकिग में इस बाात का खास ध्यान रखा जाता है कि बाहरी हवा अंदर प्रवेश ना करे। ऐसा होने से मशरूम खराब हो जाएगा ।

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