पर्यावरण मंत्रालय ने राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (नेशनल बायोडाईवेर्सिटी अथॉरिटी) को निर्देश दिए कि वे उन सभी मामलों को लें  और उन पर विचार करे जिनमें कंपनियों,  संस्थानों  या व्यक्तियों ने देश के जैव संसाधनों या उससे जुडी हुई जानकारी का व्यावसायिक या किसी और तरह से (जैसे की शोध में) इस्तेमाल किया, पर पहले से इस इस्तेमाल के लिए प्राधिकरण से स्वीकृति नहीं ली। ज्ञापन के अनुसार प्राधिकरण अब उनको जैव सम्पदा के इस्तेमाल की स्वीकृति देने पर विचार करे।

भारतीय जैव विविधता अधिनियम २००२ (बायोलोजिकल डाइवेर्सिटी एक्ट २००२) के अनुसार ये स्वीकृति उपयोग से पहले लेनी होती है।  इस नए ज्ञापन के अनुसार वे सब जिन्होंने जैव सम्पदा का उपयोग किया लेकिन उपयोग करने से पहले निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार स्वीकृति नहीं ली उनको एक और मौका मिला है कि वे जैविक विविधता अधिनियम का पालन कर सकें। ज्ञापन के अनुसार इस ज्ञापन के आने के 60 दिन के अंदर ही स्वीकृति लेनी होगी ।

राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण को केंद्र सरकार ने २००३ में देश में जैव विविधता अधिनियम २००२ को लागू करने के उद्देश्य से बनाया था । इसका काम  देश की जैव सम्पदा का संरक्षण, उसके सतत उपयोग को सुनिश्चित करना और इस जैव सम्पदा के उपयोग से होने वाले मुनाफे के निष्पक्ष और उचित बँटवारे को सुनिश्चित करना है ।

प्राधिकरण के लिए भी ये एक और मौका है कि वे कंपनियों,  संस्थानों  और व्यक्तियों की जैव सम्पदा तक पहुँच को नियंत्रित कर सकें और इस पहुँच के बदले शुल्क वसूल कर सकें ।

ज्ञापन के अनुसार स्वीकृति योग्यता के आधार पर मिलेगी । हालांकि इस पर विवाद संभव है चूंकि स्वीकृति के लिए आवेदन ही जैव सम्पदा के इस्तेमाल के बाद किया जा रहा है।

इससे पहले ऐसा ही एक ज्ञापन १० सितंबर २०१८ को आया था जिसमे मंत्रालय ने प्राधिकरण को उन सभी मामलों पर ज्ञापन आने के १०० दिनों के भीतर योग्यता के आधार पर निर्णय लेने के लिए कहा था जिनको जैव सम्पदा के उपयोग से पहले अनुमोदन की जरूरत है ।

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